Sunday, June 26, 2022
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यहां से जो जीता, उसे मिली सत्ता की चाबी, जानिए आल्हा उदल की धरती महोबा के बारे में सबकुछ

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Uttar Pradesh Assembly Election 2022: यूपी के चुनावी रण में वादों की बयार चल रही है, ऐसे में यूपी के उस हिस्से का जिक्र भी जरूरी है, जिसका स्वर्णिम इतिहास रहा है. इसके पन्नों पर जमी धूल को हटाने पर शौर्यगाथाएं उभरती हैं. बुंदेलखंड सिर्फ अपने वीरता के इतिहास के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी बेहद खास है. बुंदेलखंड आल्हा उदल की शौर्यगाथाओं की भूमि है. बुंदेलखंड के महोबा की चुनावी यात्रा के जरिए यहां आपको जानने को मिलेगा कि आखिर यहां के मुद्दे क्या हैं. इसका राजनीतिक और सामाजिक इतिहास क्या है. क्या वाकई आधुनिक भारत के विकास से महोबा जुड़ पाया है या नहीं.

कहते हैं जब अंग्रेज सेना को युद्ध के लिए भेजते थे तो आल्हा उदल की कहानियां सेना को सुनाई जाती थीं. वहीं आल्हाखंड के गायकों का कहना है कि महोबा अब भी पिछड़ा हुआ हैं. नई पीढ़ी को रिझाने के लिए सरकार की मदद की जरूरत है. आल्हा उदल बुंदेलखंड राज्य के महोबा के दो वीर योद्धा थे, जिनकी वीरता की कहानी आज भी सुनाई जाती है. उनकी वीरता को आज भी बुंदेलखंड की पावन भूमि पर याद किया जाता है. दोनों का जन्म बुंदेलखंड के महोबा में हुआ था. 

2006 में पंचायती राज मंत्रालय ने महोबा को देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों (कुल 640 में से) में से एक में शामिल किया. यह वर्तमान में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि कार्यक्रम (बीआरजीएफ) से धन प्राप्त करने वाले उत्तर प्रदेश के 34 जिलों में से एक है. महोबा इलाके में विधानसभा की दो सीटें हैं, दोनों पर बीजेपी का दबदबा है. लेकिन उससे पहले इन दोनों सीटों पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का भी दबदबा रहा है. खासियत यह है कि जो कभी भी इन सीटों को जीतता है, वह सीधे सत्ता में पहुंच जाता है. भाजपा मीडिया प्रभारी शशांक गुप्ता ने बताया कि हमें सौ प्रतिशत भरोसा है. हम महोबा में ही नहीं जीतेंगे बल्कि बुंदेलखंड की 19 सीटें भी जीतेंगे.
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महोबा को लेकर अपने-अपने दावे

महोबा हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है. भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार महोबा में 2,79,597 पंजीकृत मतदाता हैं. इसमें 1,54,857 पुरुष और 1,24,738 महिला पंजीकृत मतदाता शामिल हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने समाजवादी पार्टी (सपा) को 354 मतों से हराकर इस सीट पर जीत हासिल की थी. BSP के विजयी उम्मीदवार राजनारायण (उर्फ रज्जू) को 43,963 वोट मिले. निकटतम दावेदार समाजवादी पार्टी के सिद्धगोपाल साहू थे जिन्हें 43,609 वोट मिले थे. यहां 62.60% मतदान हुआ. समाजवादी पार्टी के योगेश यादव के पलटवार करते हुए कहा कि महोबा पहले से ही एक पिछड़ा क्षेत्र था और इन साढ़े चार वर्षों में यह और पिछड़ा हो गया है. कांग्रेस के निर्दोश दीक्षित ने कहा कि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि कांग्रेस ने 30 साल पहले महोबा में जो कुछ किया था, उस हद तक किसी ने नहीं किया. महोबा खजुराहो, लौंडी और अन्य ऐतिहासिक स्थानों जैसे कुलपहाड़, चरखारी, कालिंजर, ओरछा और झांसी से अपनी निकटता के लिए जाना जाता है.

देशावरी पान को ऐसे मिली पहचान

यूपी के महोबा ज‍िले के देशावरी पान को विश्व स्तर पर पहचान मिल चुकी है. पान की पैदावार अन्य फसलों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील होती है. पान की पैदावार सामान्य खेतों में नहीं होती है. इसके लिए विशेष तौर पर खेतों बरेजा बनाना पड़ता है, इसके लिए काफी पैसा खर्च करना पड़ता है. यह बरेजा अस्थाई होता है, जो प्राकृतिक आपदा आंधी, तूफान, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि में नष्ट हो जाता है. पान की फसल भी तबाह हो जाती है. इससे किसानों की लागत तक नहीं निकल पाती है. इसलिए इस नाजुक पान की फसल को फसल बीमा योजना में शामिल करने की मांग लंबे समय से की जा रही थी. प्रदेश की योगी सरकार ने मांग को स्वीकार कर किसानों को जैसे चुनावी तोहफा दे दिया है. देशावरी पान के बारे में राजकुमार चौरसिया बताते हैं कि जब तक यह पान ना हो तो यज्ञ पूरा नहीं होता.  एक वक्त था जब क्षेत्र में बहुत पान होता था. पहले 1800 से 2000 किसान इस पर काम करते थे, लेकिन अब 112 – 113 किसान हैं, जो पान की खेती करते हैं.

क्यों महोबा की पान की खेती को लगा झटका

प्रधानमंत्री ने कहा कि महोबा का पान देशावरी , महोबा की शान देशावरी पान. उनका यह कहना ही महोबा के पान को बहुत ताकत दे गया . पहली बार कोई प्रधानमंत्री के तौर पर महोबा आया.  महज पांच दशक पहले महोबा में पान की खेती 300 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में होती थी. आल्हा ऊदल के बाद यहां के देशावरी पान ने ही महोबा को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी. गुटका के चलन और पान किसानों को कोई सुरक्षा न मिलने के कारण पान की खेती सिमटकर 20 एकड़ रह गई.

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बुंदेलखंड की मांग भी सुर्खियों में

बुंदेलखंड राज्य का निर्माण लंबे समय से सुर्खियों में है. इसे लेकर लोगों की मिली-जुली राय है. कुछ लोगों को लगता है कि बुंदेलखंड राज्य स्थानीय लोगों के लिए समय की आवश्यकता है, जबकि अन्य का कहना है कि नए राज्यों का निर्माण जारी रखना संभव नहीं होगा. 1960 के दशक की शुरुआत से, इस क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिए बुंदेलखंड राज्य की स्थापना के लिए एक आंदोलन चल रहा है. लोगों की मांगों और विरोध के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों में से किसी ने भी इस पर कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. बुंदेलखंड राज्य का होना अभी भी बुंदेलखंड के लोगों के लिए एक बड़ा सपना है. बुन्देलखण्ड को अलग राज्य बनाने के लिए हठयोग सत्याग्रह कर रहे है तारा पाटकर का कहना है कि हम हर महीने प्रधानमंत्री को खून से खत लिखते हैं. पहले हमने प्रधानमंत्री को 1 लाख पोस्टकार्ड भेजे थे. जब कोई असर नहीं हुआ तो हमारी बहनों ने प्रधानमंत्री को राखी भेजी. यहां रहने वाले बच्चों ने बर्थडे मेसेज भेजे थे. हमारी यह शपथ तब तक बनी रहेगी जब तक हमारे प्रधानमंत्री हमारी बात नहीं सुनेंगे.

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